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कहते हैं कि जब अपने दामन पर दाग गहरे हों, तो लोग दूसरों पर कीचड़ उछालने में सबसे आगे रहते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प और हास्यास्पद मामला इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। धारा 420 के गंभीर जालसाजी मामले में फंसकर, मूल संगठन से बेइज्जत होकर भगाया गया एक पूर्व कर्मचारी आजकल खुद को ‘कर्मचारी नेता’ घोषित कर घूम रहा है। मान्यता का अता-पता नहीं है, लेकिन एक अवैध (गैर-मान्यता प्राप्त) दुकान सजाकर यह महाशय मीडिया में अनर्गल और भ्रामक प्रचार-प्रसार कर रहे हैं, ताकि अपने काले कारनामों पर पर्दा डाला जा सके।
नौकरी के नाम पर 4 लाख की ठगी, हाई कोर्ट के आदेश पर हुई थी FIR
कथित नेताजी का असली चेहरा बेहद ‘चमकदार’ है। भोले-भाले बेरोजगारों को नौकरी लगाने का झांसा देकर इन्होंने 4 लाख रुपये की मोटी रकम डकार ली। जब नौकरी नहीं लगी और पैसे वापस मांगने पर इनकी नीयत डोल गई, तब पीड़ित पक्ष को देश की न्यायपालिका की शरण लेनी पड़ी। माननीय हाई कोर्ट के सख्त आदेश के बाद इनके खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज हुई। वर्तमान में सत्र न्यायालय (Sessions Court) में इनके खिलाफ धोखाधड़ी का गंभीर मुकदमा चल रहा है। आज जो महोदय सफेदपोश बनकर घूम रहे हैं, वो असल में बेल (मुचलके) पर छूटे हुए आरोपी हैं और फैसला आने तक ‘नेतागिरी’ का शौक पूरा कर रहे हैं।

चंदाखोरों की टोली और विघटनकारी सोच
इस स्वयंभू नेता के साथ कुछ और भी ऐसे चंदाखोर और चाटुकार जुटे हुए हैं, जिनका एकमात्र काम संगठनों को तोड़ना और अपनी जेबें भरना रहा है। नकारात्मक और विघटनकारी सोच रखने वाले इन सभी तत्वों ने अब एक नया ‘गठबंधन’ बना लिया है। इतिहास गवाह है कि जो भी इस कथित नेता के सानिध्य में गया है, उसका ‘बंटाधार’ (मीडियामेट) होना तय रहा है। आज भी दो-तीन भोले लोग इनकी संगत का खामियाजा भुगत रहे हैं और विभागीय व कानूनी कार्रवाई की आग में झुलस रहे हैं।
जुलाई में तय है अंतिम फैसला, पतन बेहद नजदीक
बेशर्मी की पराकाष्ठा देखिए कि जो खुद कोर्ट के चक्कर काट रहा है, जो खुद 420 के दलदल में धंसा हुआ है, वो आज समाज और कर्मचारियों को ज्ञान बांट रहा है। लेकिन झूठ के पैर नहीं होते। इस पूरे मामले में अदालत में सुनवाई पूरी हो चुकी है और अंतिम फैसला आगामी जुलाई महीने में आना नियत है।
संगठन के जागरूक सदस्यों का कहना है कि विनाशकाले विपरीत बुद्धि। जितने भी विघटनकारी तत्व आज एक मंच पर आकर उछल-कूद कर रहे हैं, उनका कानूनी पतन जुलाई में पूरी तरह निश्चित है। कुछ का पतन तो इससे भी पहले बेहद निकट है। कानून के हाथ लंबे होते हैं और बहुत जल्द इस ‘स्वयंभू नेता’ और इसकी चंदाखोर मंडली का असली ठिकाना सलाखों के पीछे होगा।