सिकल सेल के प्रसार को रोकने के लिए जरूरी है भावी जीवनसाथी के सिकल सेल कुंडली मिलाने की l विश्व सिकल सेल जागरूकता दिवस 19 जून के अवसर पर स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में सिकल सेल स्क्रीनिंग एवं जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन l
रक्त से जुड़ी आनुवंशिक बीमारी सिकल सेल एनीमिया को लेकर सोमवार को पंडित जवाहर लाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय एवं डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग द्वारा सिकल सेल जागरूकता एवं स्क्रीनिंग कार्यक्रम का आयोजन टेलीमेडिसिन हाल में किया गया।
सिकल सेल संस्थान एवं रायपुर सोसायटी ऑफ पेरिनेटोलॉजी एंड रिप्रोडक्टिव बायोलॉजी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में मरीजों के रक्त के नमूने लेकर सिकल सेल बीमारी की जांच की गई तथा इस बीमारी के फैलाव को रोकने से संबंधित उपायों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि एवं अधिष्ठाता चिकित्सा महाविद्यालय डॉ. तृप्ति नागरिया ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि आने वाली पीढ़ी में सिकल सेल के प्रसार को रोकने के लिए वैवाहिक संबंध तय करते समय सबको इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि भावी जीवनसाथी छोटी सिकलिंग (ss) एवं बड़ी सिकलिंग (As) पॉजीटिव न हों।
सिकल सेल बीमारी की रोकथाम की दिशा में एक कदम आगे बढ़ते हुए हम सभी को विवाह के लिए सिकल सेल की जेनेटिक कुंडली मिलाने एवं इसके स्क्रीनिंग या जांच करने पर अधिक जोर देना होगा।
डॉ. अरविंद नेरल ने बताया कि सिकल सेल बीमारी को रोकने के लिए विवाह पूर्व और गर्भावस्था के दौरान संभावित लोगों की सिकलिंग की जांच और उनके परिणामों के आधार पर पालकद्वय की काउसिलिंग और परामर्श किये जाने से आने वाली पीढ़ियों में इस बीमारी के फैलने पर अंकुश लगाया जा सकता है। सभी गर्भवती महिलाओं के लिए अन्य परीक्षणों के साथ ही सिकलिंग टेस्ट भी अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। विश्व के कुछ देशों में कानूनी तौर पर सिकल सेल जांच को अनिवार्य किया गया है और उन देशों में इसके काफी अच्छे परिणाम देखने को मिल रहे हैं।
फॉग्सी के मेडिकल डिसऑर्डर इन प्रेग्नेंसी कमेटी के अध्यक्ष डॉ. मनोज चेलानी ने अपने उद्बोधन में कहा कि शासन द्वारा इसकी निःशुल्क जांच की व्यवस्था है। इसके साथ ही उन्होंने गर्भावस्था के दौरान इस समस्या को नियंत्रित करने के विभिन्न उपायों की चर्चा की।
विभागाध्यक्ष स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग डॉ. ज्योति जायसवाल ने बताया कि इस कार्यक्रम के दौरान लगभग 150 लोगों की सिकल सेल की प्रारंभिक जांच की गई और आवश्यकता पड़ने पर इस बीमारी की पुष्टि के लिए एचपीएलसी जांच की जाएगी। भविष्य में चिकित्सा महाविद्यालय में जेनेटिक लैब के माध्यम से आनुवंशिक बीमारियों की जांच हो पाए तथा फीटल मेडिसिन की दिशा में प्रयास प्रारंभ हो सकें इसके लिए विभाग सदैव प्रयासरत है। कार्यक्रम का प्रबंधन डॉ. किशोर चौहान एवं पंकज ने किया वहीं कार्यक्रम का संचालन डॉ. अंजुम ने किया।
विभाग के पी. जी. छात्रों ने प्रश्नोत्तर के माध्यम से सिकल सेल एनीमिया को लेकर मरीजों एवं उनके परिजनों की शंकाओं का समाधान किया। विभागाध्यक्ष मेडिसिन रोग विभाग डॉ. डी. पी. लकड़ा ने सिकल सेल बीमारी के बचाव और प्रबंधन विषय पर जानकारी देते हुए बताया कि आजकल सिकल सेल बीमारी के लिए बहुत अच्छी दवाएं उपलब्ध हैं जिनका चिकित्सकों के मार्गदर्शन में सही समय पर सेवन कर इस बीमारी से उत्पन्न जटिलताओं एवं समस्याओं को नियंत्रित किया जा सकता है। इस अवसर मेडिसिन विभाग के डॉक्टर सुरेश चंद्रवंशी, डॉ. सी. एस. शर्मा, डॉ. निमेष साहू समेत पी. जी. छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।