छत्तीसगढ़ शासन द्वारा निरंतर जागरूकता अभियान चलाये जाने के इस वर्तमान दौर में भी शासकीय अस्पतालों में यह परिलक्षित हो रही है कि कैंसर पीड़ित लोगों में से ज्यादातर मरीज इस बिमारी के अंतिम चरण में ही इलाज हेतु अस्पताल आ रहे हैं l
जागरूकता अभियानों में यह बारंबार बताया जाता है की अंतिम चरण में कैंसर का इलाज न केवल कष्टसाध्य और खर्चिला है, बल्कि रोगी के जीवन की गुणवत्ता भी संतोषजनक नहीं होतीl यदि इस रोग की प्रारंभिक अवस्था में ही निदान हो जाये तो न केवल निवारण ही तुलनात्मक सरल है, बल्कि रोगी के जीवन की गुणवत्ता को इस सीमा तक संधारण किया जा सकता है की वह परिश्रमशील रहेl

बैनर, पोस्टर, व्याख्यानमाला, सडकों-चौराहों पर रैली तथा कैंडल लाइट प्रदर्शनों के वावजूद भी ‘त्वरित निदान-शीघ्र समाधान’ का सन्देश आम जनता के मानस पटल पर बैठ नहीं रहा हैl
ज्ञात हो की प्रदेश के राजधानी स्थित शासकीय डॉ भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय में क्षेत्रीय कैंसर इलाज व अनुसंधान इकाई आधुनिक मशीनों, उपकरणों, प्रयोगशाला तथा दक्ष मानव संसाधन युक्त होकर सेवा में कृतसंकल्प हैl परन्तु यह सरकारी संस्था अपनी मशीनों तथा आधुनिकीकरण के पहले यह सदैव रेखांकित करते आ रही है की समय, समय पर होने वाले कैंसर डिटेक्शन कैंप में ज्यादा से ज्यादा लोगों को आना चाहिए, ताकि त्वरित निदान हो सकेl
इस संस्थान में कार्यरत मेडिकल लैब तकनीशियन श्री रामप्रसाद धारिया ने अपना अनुभव ‘स्वास्थ्य सन्देश’ के साथ साझा करते हुए कहा की ‘त्वरित निदान-शीघ्र समाधान’ का सन्देश अपने वांच्छित लक्ष्य को अपेक्षा के अनुरूप प्राप्त नहीं कर पा रहा हैl
समाज के हितार्थ श्री धारियाजी ने बताया की एक प्रकार की जांच की जाती है जिसे सी बी सी कहते हैं और अंग्रेजी में यह है Complete Blood Count. रक्त में श्वेत रक्त कोशिकाएं बढ़ जाती है और इसमें बेसोफिल बढ़ा हुआ दिखता है, जो कैंसर के लक्षण है l